Life Story of Mahatma Gandhi

हेलो दोस्तों, आज हम एक ऐसे महापुरुष के बारे में बात करने वाले है जिसने हमारे देश के लिए अपनी जान तक देव पे लगा दियी थी और आज हम उसी की वजह से आजादी से अपनी जिंदगी जी रहे है. जी है दोस्तों उस महापुरुष का नाम महात्मा गांधीजी है. आयी तो उनके जीवन के कुछ किस्सों के बारेमे बात करते है.

Mahatma Gandhi

गांधीजी भारत के उन महापुरषों में से एक है जिसने संसार में देश का नाम उचा किया, उनमें महात्मा गांधी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर के नाम योग्य है। राजनीतिक दृष्टि में, अपितु पार्मिक और नैतिक दृष्टि में गांधीजी की मिशाल उचित है। सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों पर बरसे हुए उन्होंने अपने जीवन को इतना ऊंचा उठाया था कि उनकी तुलना में बुद्ध और महात्मा ईसा से की जा सकती है।

उनकी मृत्यु पर दुःख व्यक्त करते हुए विश्वविख्यात विज्ञानवेत्ता प्रनबर्ट माइंस्टीन ने कहा था-‘कुछ समय माद लोगों के लिए यह विश्वास करना भी कठिन हो जाएगा कि किसी समय सचमुच कोई इतना महान व्यक्ति पृथ्वी पर जीवित भी था।’ महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास करमचन्द गांधी था। कर्मचन्द उनके पिता का नाम था और गांधी उनकी जाति थी।

गांधी याद गन्धीका अपभ्रंश रूप प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि उनके पूर्वज किसी समय गन्ध मर्थात् त इत्यादि का व्यापार करते रहे होगे । गांधीजी का जन्म २ अक्तूबर, १८६८ में पोरबंदर में हुवा था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा पोरबदर में ही हुई। गांधीजी पर अपनी माता के सभाव का गहरा प्रभाव पड़ा। जब गांधीजी कुछ बड़े हुए तो यह तय किया गया कि मरिस्टरी पास करने के लिए उन्हें विलायत भेजा जाए.

गाधीजी के पिता राजकोट रियासत के दीवान थे। इसलिए वे अपने पुत्र की शिक्षा भली भांति कराना चाहते थे। उन दिनों बैरिस्टरी पास करके वकालत करना ही सबसे अधिक लाभजनक और प्रतिष्ठा- जनक पेशा समझा जाता था। किन्तु गांधीजी की माता उन्हें विदेश भेजना नहीं चाहती थी । उनका विश्वास था कि विदेश जाकर युवकों का पात-पतन दूषित हो जाता है। गांधीजी में माता की अनुमति प्राप्त परने के लिए उनके सम्पुरा प्रनिता की: “विदेश में मैं शराब, मास और मदिरा पान से दूर रहेंगे।”अपनी इस प्रतिज्ञा मा इंग्लड में रहते हुए उन्होंने मायन्त दृढ़ता और ईमानदारी के साथ पालन किया।

इंग्लॅण्ड से बैरिस्टर यी उपाधि लेकर गाधीजी भारत मा गए, किन्तु वकालत वाम्यवसाय उनके मन के अनुकूल नहीं था। इस पेडो मे पानी पिलाये बिना काम बनना कठिन है मौर गांधीजी ने बचपन से ही सत्य पर डटे रहने का निश्चय किया। अदालत में गाधीजी को सफलता नहीं मिमी पौर उन्होने वह पैशा छोड़ दिया । उन्हीं दिनों एक यापारिक समस्या के एक मुकदमे को निपटाने के लिए गाधीजी को दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा।

दक्षिण कोवा मे गांपाशी निग मुकदमे के सिलसिले मे गए थे, उसे उन्होंने ममनीने द्वारा निपटया दिया। किन्तु वहा जाकर उनके जीवन की दिशा ही मुड़ गई। दक्षिण मशीना में बहुत बड़ी सस्था में भारतीय रहते थे। ये भारतीय किसी समय मजदूरी करने के लिए एक ऐग्रीमेंट की शर्तों के अनुसार यहां लाए गए पे; इसीलिए इन्हें ‘गिरमिटिया’ कहा जाता था।

गोरे मोग इन भारतीयों के साप पशुमो से भी बुरा बर्ताव करते थे और ये भारतीय उग मारे पत्रगान और लाहना को गिर झुकाकर सह लेते थे। गांधीजी ने ऐनै दुर्घबहार के सामने सिर झुकाना स्वीकार न किया। एक बार भदालत में उनसे पगडी उतारने को कहा गया। गांधीगी ने भदालत में निकल जाना मंजूर किया पर पगटी उतारना नही।

इस प्रसार अन्याय के विरुद्ध विद्रोह करके उन्होने भारतीयों में एक नई चेतना जगाई। वैसे गांधीजी पायद जल्दी ही भारत वापस लौट पाते, किन्तु भारतीयों की दुर्दशा को देखकर उन्होंने पोला मे ही रहने का निश्चय कर लिया । उन्होंने १८६४ मैं नेटाल इटियन कांग्रेस’ कोरगापना की, जिसने भारतीयों के अधिकारों के लिए संपर्ष भारमानिया। दो वर्ष तक मक्रीका में पान्दोलन चलाते रहने के बाद गायोनी भारत पाए। उनके मायमन का उद्देश्य यह था कि भारतवागियों कोशिण घाफीवा के भारतीयों की स्थिति का ज्ञान कराया जाए।

भारत में छः मास तक रहार उन्होंने सारे देश मे प्रचार रिया और उसके बाद २०० भारतीयों के माप पफीका वापस लौटे। इस समय तक मशीका की सरकार सचेत हो चुकी थी।पोरे लोगों में भारतीयों पर विशेष रूप से मांधीजी के पितष की याम नाक चुकी थी। पहले तो २० दिन तक पकोका की सरकार ने डा भारतीयों को जहाज से उतरने हीनदिया; और जब उन्हें उतरने दिया गया तो गोरों ने गांधीनी

पर भारमण किया और यह केवल संयोग की ही बात थी कि उस दिन नायौ केप्राण बच गए। दमिण भकीमा में रहते हुए गांधीजी ने सत्याग्रह मौर मराहयोग की नई च तियों से सरकार का विरोध करना गुरूपिया। सत्य पर डटे रहना, भयान कानूनों का पालन न करना पौर अन्याय करने वाली सरकार के साथ सहयोग करना उनकी नई मूझ थी।

उनका कपन पा कि यदि हम पात्र के विपक्ष भी । भाव न रखें,वोहम उसो हृदय को जीतकर उसे अपना मित्र बना सकते हैं। दक्षि मझीका में सत्यामह द्वारा गांधीजी को माशातीत सफलता प्राप्त हुई। गांधी मौर बनरल स्मट्स में एक सनमीता हुमा, जिसके द्वारा भारतीयों को कार्य मधिकार दिए गए। १९१५ में गाधीजी ने भारत में भाकर यहां की राजनीति में प्रवेश किया। जित महिंसा और सत्याग्रह से उन्हें भफीका में सफलता प्राप्त हुई थी, उसीका प्रयोग भारत को स्वाधीन कराने के लिए उन्होंने पुरू किया।

पहला सत्याग्रह- मांदोलन १९२० में शुरू हुमा। किन्तु उस समय तक लोग गापीजी के सिद्धांतों को पूरी तरह समझ नहीं पाए थे। चौरीचौरा नामक प्राम में सत्यापह के सित- सिले में हिंसात्मक उपाय हो गया। गांधीजी ने, जो सन्चे हृदय से हिंसा के समर्षक थे, सत्याग्रह को तब तक के लिए स्थगित कर दिया जब तक कि सोय महिमा का पातन करना भनी मांति न सीख पाएं। दस साल तक गांधीजी देश में प्रचार करके सत्याग्रह के लिए उपयुक्त दाता- वरण तयार करते रहे। १९५० में दुबारा सत्यारह शुरू किया गया और इस बार सरकार को मुखना पड़ा।

नन्दन में सममोते के लिए एक गोलमेज बाग बुलाई गई, किन्तु उसने कोई लाभ न हुभा । मारत लौटने पर गाभोगी को सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। गांधीजी ने स्वाधीनता-मांदोलन को जनता का प्रदोलन बना दिया। उनसे पहले स्वाधीनता की लड़ाई या तो मारामसियों पर बैठने याने नेटामो के हाथ में पी या फिर दिशात्मक कार्रवाई द्वारा शासन-सत्ता को उलटने या प्रमाल करने मातंकवादियों के हाथ में रिन्तु गांपीबी के नेतृत्व में देश के सर मदर

पौर रिझान इस लड़ाई में भाग लेने को तैयार हो गए । सरकार ने मत कहे जाने बाने वर्ग को हिन्दुयों से पृथक् करने के लिए ‘साम्प्रदायिक निर्णय’ नामक पोषणा की जिससे पाहतों को सुनावों में पुषक अधिकार दिए गए थे। गांधीजी मे इस निर्णय के विरोध में २१ दिन का अनशन किया पोर इस निर्णय को कुछ मंगो में बदलवा दिया। १९३० मे १RI का समय रचनात्मक कार्यक्रम में बीता | Rमें दूसरा विश्व युद्ध छिड़ गया। प्रथम महायुद्ध में गाधीजी ने इस पापा से अंग्रेजी की सहायता की थी किनड़ाई के बाद भारत को स्वाधीन कर दिया जाएगा।

परन्तु प्रथम विश्व युद्ध के बाद सरकार ने भारत में और भी अधिक बटोर कानून बनाकर दमन शुरू किया। इसलिए द्वितीय विश्व युद्ध डिाने पर गाधीजी ने तब तक अंग्रेजों की महामना करने से इन्कार कर दिया जब तक वे भारत को स्वाधीन न कर। १४२ मेगापीजी में ‘भारत छोडो’ नारा लगाया भोर अग्रेजों के विष्ट देशव्यापी माग्दोलन प्रारम्भ कर दिया।

सरकार ने बड़ी सस्ती से इस पाम्पोननपोरवा दिया। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति पर विश्व की राजनीतिक स्थिति बहुत बदन नई माई से पहले मोनिटेन संसार की सबसे बड़ी पति समझा जाता था, भव घटकर नीमरे नम्बर पर पाया। भारत में TER’भारत छोड़ो’ धान्दोलन और पाजाद हिन्द मेना के बलिदान के कारण प्रबल साहनीतिक चेतना जाग उठी दी। सेना, पायु मैना, नौसिना और पुलिग तक ने हस्ताने साओं ने भारत को सोर जाने में ही अपना रस्याग समभा पौर १९४७ मे देश को, भारत पोर पारितान, दो दारों में बाटकर ये पते गए। देश के बंटवारे के मामय जगह-जगह भयानक भार-नाटहुई।

अहिंसा के पृगारी गोपीयोगसे यहा दुरापानीमावाली में शान्ति स्थापित करने के लिए उन्होंने पैदल यात्राीपौर दिल्ली मेदंगों को रोपने के लिए उन्होंने पामाग स्नान भी किया। गांधीजी का न मारे जीवन-मर भुगनमानों को संतुष्ट करने कोही पीर हावापद मे समझते थे कि प्रत्ययक होने के नाते मुसलमानों दियों ऐसा होरिमितना चाहिए पैसा छोटे भाई मोबड़े भाई मिलता

है । सो से बहानी सोग नि मोर दार थे। एक दिन जनवरं Petम को जब पानी प्राणेना-गना में पाने, तो नापगन गोडगं नान तिने freोतीन गोनिरागार उनकी हत्या कर दी। गोपीजी के पारित की सबसे सीमिता पी-अन्याय के विपन दिई पारिक मन मोदि में गांधीजी बितरुत मामूली और बयान में बडे चमू और भाभी थे,हिर भी उनस मनोवन समाधारण था।

सार निः हकरना मोर प्राणमय होने पर भी उसार परिय रहना ही गाधीजीवीवहार से बड़ी पिशेषता यो जिसने उन्हें समार के सपने बड़े महापुरुषों की श्रेणी में ना राड़ा किया। उन्होंने साय पौर हिंसा के शिान्तों को अपनाया था। नशा म्यक्तिगत बीपन में, अपितु राजनीति में भी वे इनका प्रयोग करते थे और वे शायद सबसे पहले राजनीतिज बिहानि पहा रिजीवन और रानीति के निशान पुष नहीं होने चाहिए। यदिव्यक्तिगत जीवन में सत्य का महत्व है तो राजनीति में भी उसका बंशा ही महत्व होना चाहिए।

बहुत-से लोगों का विचार है कि गाधीजी की महिया एक राजनीतिक चान यो।योकि पराधीन देश निःशम था और परम शक्तिशाली प्रिटिश सत्ता का शास्त्रयत से विरोध नहीं कर सकता था, इसलिए गाधीजी ने पहिसा का मार्ग अप- माया । यह बात पगतः ठीक हो भी सकती है, फिर भी यह मानना पडेगा कि ऐसौ महिंसा की साधना के लिए उससे भी अधिक साहस की पावश्यक्ता है, जिजनौ हिवात्मक युद्ध के लिए। गांधीजी ने केवन राजनीति ही नहीं, अपितु जीवन के सभी क्षेत्रों में लोगों को मार्ग दिखाने की चेष्टा की ।

सन्त तो वे बन ही गए थे; दीन-दरिद्रो और रोगियों की सेवा में उनका काफी समय बीतता था। गावों की दशा सुधारने, स्त्रियों को शिक्षा देने मौर अस्पृश्य समझो गने वाली जातियों को सवर्ण हिन्दुओं के समान मधिकार दिलाने के लिए उन्होंने बहुत कार्य किया । ममेचों पर उन्होंने जो सबसे बड़ी नोट की, वह यी-स्वदेशी मान्दोलन । उनका कथन या कि हमें स्वदेश में बनी वस्तुमों का ही व्यवहार करना चाहिए। इसका परिणाम यह हुमा रिमा- शायर मोर मागाटर की मियों में काम ठप्प हो गया।

उन्होंने अनेक पुस्तक भी लिखीं। हरिवन’ पौर ‘हरिजन-मेषक’ मानक साप्ताहिक पत्र भी वे निकालते थे। उससे पहले उन्होंने ‘यंग इंडिया’ नामक अख़बार भी निकाला था। उनकी भाषा सरल और मरोष तथा प्रतिपादन- लोपत्यन्त प्रभावशाली थी। इतने महान होते हुए भी गांधी इस बात को पसफल समझते थे।

Summary

जब देश को स्वाधीनता प्राप्त हो गई, इससे उन्हें बडा सन्तोष होना चाहिए था; किन्तु नहीं हिन्दू-मुसलमानों में एकता स्थापित नहीं करा सके। देशका विभाजन उनके सामने हुआ ऐसे जीवन चर्तित्र धरने वाले व्यक्ति शायद अब हमें कोई देखने को मिले। यह हमारा सौभाग्य है की उनका जन्म भारत में हुआ था

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