स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी कुछ बातें

नमस्ते मित्रो, आपको तो पता ही है की हमें आजादी मिलने में कितने साल लगे और अंग्रेजो ने भारत पर सौ साल से ज्यादा राज किया। यही समय में भारत के कुछ विरो ने भारत की आजादी के लिए कुछ महत्व के काम किये थे जो आज हम इस पोस्ट में देखेंगे और शायद यह बात आपको कही और जानने को नहीं मिलेंगे.

स्वतंत्रता संग्राम 1956

महारहवीं शताब्दी मे पेजो ने भारत पर धीरे-धीरे कम्जा करना शुरू किया। | अ के नेतामों ने, जो उस समय राजा या नवाब होते थे, अंग्रेजों के खतरे को मनु- व किया और उनके पाव मजमने देने के लिए भरपूर कोशिश की। परन्तु उस समय राजनीतिक परिस्थितिया ऐसी थी कि पंजों की प्रगति को रोका न जा सका.

और देखते-देखते उन्होंने सारे देश पर अपना अधिकार कर लिया। परन्तु वस्तुत: भारत को स्वाधीनता को लड़ाई एक दिन के लिए भी बन्द नहीं है। जद मंग्रेजों का प्रभाव बढ़ रहा था, तब भी वह जारी रही और जब अंग्रेजों | पूरा माधिपत्य इस देश पर जम गया, तब भी उन्हें उसाड फेंकने के लिए प्रयत्न | गरी रहे।यारियां तो बहुत समय से चल रही थी,परतु उनका परिणाम पहले-पहल | १८५७ के महाविद्रोह के रूप में प्रकट हुमा । यह विद्रोह बहुत बड़े पैमाने पर संगउन किया गया था।

परन्तु कुछ सिपाहियों को जल्दबाजी के कारण यह समय में पहले शुरू हो गया और बाद में भारतीय सिपाहियों में अनुशासन और सगठन की कमी के कारण यह दवा भी दिया गया। इस विद्रोह को दबाने में पजाब की रियासतों ने अंग्रेजों को बहुत सहायता की। विद्रोह को कुचलने के बाद अप्रेजों ने भारत पर बड़ी कठोरता से शासन करना शुरू किया।

किन्तु साथ ही उन्होंने इस बात का भी ध्यान रसा कि अब ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न न होने पाएं, जिनसे वैसा ही कोई दूसरा विद्रोह फिर भाको इसी उद्देश्य से इंग्लंद की रानी विक्टोरिया ने भारत कायमन हसिन से पीनकर मरने हाथ में ले लिया। इंग्लैंड में उस समय भी प्रजातन्त्र पाना इसीलिए भारत में कुछ न कुष कानूनी शासन ही चलता रहा।

सन् १८८५ में अखिल भारतीय कांग्रेस नामक संस्था स्थापना हुई। संस्थापक मिस्टर हम एक अंग्रेज था और गुरू में कायेस का उद्देश्य यह वह सरकारी कर्मचारियों के लिए कुछ अधिक मुविधामों की मांग करे। बाद कांग्रेस मे पनेक नये नेता भाले गए और समय बीतने के साप-माय कायस के गंदे मे भी परिवर्तन होता गया। पहले कांग्रेस ने राजनीतिक मुपारों की मांग की। १९२६ में लाहौर में हुए अधिवेशन मे पूर्ण-स्वाधीनता प्राप्त करना मरना मा घोषित किया।

गुरु में बांग्रेस उन राजनीतिज्ञों का प्रसादा पो, जो पारामी पर वाद-विवादकरते थे और ममामों मे सम्बे-सम्ये भाषण देते थे और प्रशारत परते थे। पज सरकारमान राजनीतिजों जरा भी भयभीत नहीं थी। इप समय बाद कांग्रेस में सोकमान्य तिलकधी मोगों का प्रभाव पार हिंसात्मक उपायों तक से देश को स्वाधीन कराना चाहते थे।

ऐगे नेतायों को पार ने लम्बी-लम्बी सजा दी और उन्हें देश में निर्वासित कर दिया। सन् १९१२ मे भारत की राजनीति में महात्मा गांधी ने प्रवेश किया। उन्होंने पांग्रेस को वागओर अपने हाथ में ली । सत्याग्रह, पसहयोग और स्वदेशी मादोलन द्वारा उन्होंने स्वाधीनता को लड़ाई कोमागे बहाया। इन पादोलनों से एक मोर तो प्लंड पर करारीमायिक बोट पडी और दूसरी मोर देश मे पशहर-हर मोर गांव- विम पावादीको पुकार गूज उठी। पिस्तौल लेकर लड़ मरना हरएक मादमी बस का नहीं था, परन्तु स्वाधीनता के लिए लाठियां पाना मौर जेल जाना ऐसा पाम था, जिसे करने के लिए मनुष्य अधिक पासानी से तैयार हो जाता था। पापीजी ने तीन बार सत्याग्रह मान्दोलन किया।

उनका १६४२ में किया गया ‘भारत छोडो’ पांदोलन बहुत बड़ा था। देश की जनता ने इन सब पांदोलनों मै स्वाग, दलिदान पोर कीरता का अनुपम परिचय दिया। किंतु सात समुद्रों पर राग्य करने वाले भग्रेजी की ताक्त इनसे हिलो नही १६४२ के पादोलन को भी पड़ों ने वही निर्ममता से पुचल दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के दिनों में सुभाषचन्द्र बोम कांग्रेस के प्रधान चुने गए । उन दिनों सारे देश पर महात्मा गांधी का एकछत्र प्रमाव था।

परन्तु मुभाष बाबू की विचारधारा देश में इतनी लोकप्रिय हुई कि गाधीजी के न पाहते हुए भी उन्हें दो यार पत्रिम का पान चुना गया । परन्तु काग्रेस के कृष कर्णधारो ने मुभाष बाबू से सहयोग करने से इन्कार कर दिया। पर की फूट को बचाने के लिए सुभाष बाबू ने कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया पौर मौका पाकर देश से भाग निकले।

पहले जर्मनी और बाद में जापान जाकर उन्होंने भाजाद हिंद फौज का संगठन किया। इस फौज ने पानियोरे साथ मिलकर भारत को स्वाधीन कराने के लिए सशस्त्र लड़ाई लड़ी। माप साधनों और प्रतिकूल परिस्थितियों मे माजाद हिंद फौज के वीर सैनिकों ने त्रिम पोला और धर्म का परिचय दिया, वह सेनामों के इतिहास में अनुपम और भारत के इतिहास मे स्वारों में लिया जाने योग्य है।

परंतु जापानियों के हारने के बाद पाशाहिर की फ़ौज भी हार गई। भारत पर शासन करने के उनके दिन लद गए, क्योंकि वे तो पुलिस मौर रेबल पर ही इस देश पर पासन कर रहे थे। उस मोर दितीय विश्व युद्ध की समाप्ति पर संसार का शक्ति संनुनन! कुल बदल गया। पुट से पहले जो ब्रिटेन संसार की सबसे बड़ी शक्ति सममा पा, यह सब पटकर तीसरे नम्बर पर रह गया।

इस मौर अमेरिका का। कोई स्वार्थ नहीं था कि भारत पराधीन रहे। उपर मनेजों ने यह देखा कि भारत पर शासन करना लाम का नहीं, अपितु घाटे का सौदा है, इसलिए उन मलेमानसों की तरह देश को छोड़कर चले जाना मला समझा। उन्होंने मी का शासन भारतीयों को सौंप दिया और बड़ी शान्ति और सम्मान के भारत से सौट गए । इसका परिणाम यह हुआ कि भारत और इंग्लंड में पर मित्रतापूर्ण सम्बन्ध है मौर व्यापार द्वारा इंग्लैंड को भारत से मब मौकरी रुपये की भाय प्रतिवर्ष होती है।

परन्तु अंग्रेज देश का शासन भले रूप में नहीं छोड़ गए । जाने से व उन्होंने देश को भारत और पाकिस्तान दो हिस्सों में बांट दिया और समस्याएं ऐसी खड़ी कर दी, जिनके कारण भारत और पाकिस्तान भब तक शान्ति ॐ नहीं बैठ पा रहे हैं। दोनो को रक्षा-व्यवस्था पर भारी धन- खर्च करनी पड़ रही है। परन्तु स्वाधीनता मपने प्रापमे इतनी माकर्षक बस्त है कि उसके लिए यह बलिदान कोई बड़ा बलिदान नहीं है।

Summary

आपने यहाँ आज एक स्वतंत्र संग्राम के बारेमे एक किसा देखा जिससे मुझे लगता है की आपको अपने देश के बारेमे भावना और भी बढ़ गयी होगी। ऐसे ही आजादी के वख्त या उसे पहले बहोत सारे वीर पुरुष ने अपनी जान देकर देश को आजाद किया था जो हम कभी भूल नहीं सकते और यह किस्सा भी उसी से जुड़ा हुआ है.

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